एक छोटी सी कोशिश, जीवन को एक नाव के जैसे दिखाने की, जो एक किनारे से निकलकर ... गुजरती है , तूफानों से, सुख-दुःख की कलियों से और आ पहुचती है दूसरे किनारे । मैं इस कविता में , छे पंक्ति मे मनुष्य के जन्म से मरण तक की जिन्दगी दिखाने की कोशिश की हूँ । पहेले पंक्ति में छोटा बच्चा जो बिना सहारे से आगे न बढता है, दूसरे में वो सुख - दुःख को देखता है मगर समझता नही है और अपने जीवन के नाव को संभाल ने की कोशिश कर्ता है। तीसरे में वो जावन है जो सुख -दुःख को समझता है और कुछ जिन्दगी में कर दिखाने की कोशिश करता है । चौतें में वो मुश्किलों का सामना कर्ता है , मगर अकेलापन हमसफ़र के साथ को ललकारता है. फिर छठा आता है, ग्रहस्ती जीवन, जो दोनो मिलकर संभालने की कोशिश करते है. मगर कुछ लोग संभल कर आगे निकलते है और कुछ बिछुड़ जाते है. फिर अन्तिम पंक्ति में आदमी फिर से पहला जैसे बन जाता है. किनारा दिकते ही वो अपनों के सहारे का आशा रखता है, जो कुछ नसीब वालो को मिलता है और किसी को नही मिलता। बस यह एक जिन्दगी का एक रुप है, जिसे इस कविता के रुप में फरमान करने की कोशिश किया है .:)
चली कश्ती जीवन के किनारे से,
आगे न बड़ी सहारो के सहारे से।
ऊछ्ले - खूदे लहरो की मस्ती में,
तैरते गये जीवन की कश्ती में।
कुछ दूरी पर पतवार थामी,
मगर बार-बार सहारो से सीख मांगी।
गुजरे अनदेखी सुख-दुःख की बस्ती ,
अनजान से देखते रहे , क्यो ये रोती - हँसती।
बेसहारे से कश्ती चलती गयी,
हर मोड़ पर सोच बढती नयी।
अजनबी बस्ती की समझ पायी,
नयी किरणों से कुछ पाने की उमंग छायी ।
अड्चनो का तूफ़ान आगे न छोंडा,
हर बार कश्ती को अलग राह मोडा।
अकेले संभाला लहरो का ऊतार - चढाव,
दिल का कोना चाहा हमसफ़र का बढाव।
थामे एक - दूसरें का हाथ बनके सहारे ,
सपने खिले , छूमे जीवन में बहारे ।
संभाला कश्ती , कभी बाहर , कभी अन्दर ,
कोई बिछुड़े , कोई चले साथ समंदर ।
ऐसे ही तैरी जीवन की नाव,
सहारो से चाहा सहारे की छाँव।
कोई पाया, कोई अकेला गया पार,
छूमा किनारा , कोई हँसके , कोई लेके करार।
-- सुमना
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